भेष बदल कर कलकत्ता की गलियों में घूम रहे थे जॉर्ज फर्नांडिस, गिरजाघर से हुई गिरफ्तारी, पेशी में जंजीरों में नजर आए

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ के 123वें एपिसोड में आपातकाल की 50वीं बरसी पर जॉर्ज फर्नांडिस की कहानी को याद कर लोकतंत्र की लड़ाई के उस जज़्बे को फिर से जीवंत कर दिया। उन्होंने कहा कि जॉर्ज को मीसा जैसे कठोर कानून के तहत बेवजह जेल में डाला गया, और जब अदालत में पेश किया गया तो उनके हाथ-पैर लोहे की जंजीरों से बंधे थे। पीएम मोदी ने उस दृश्य को लोकतंत्र के गले की घंटी बताया।

1975 की 25 जून की रात देश पर आपातकाल का काला साया छा गया। लोकतंत्र पर हमला हुआ और स्वतंत्रता कुचल दी गई। ऐसे समय में एक नाम गूंजा—जॉर्ज फर्नांडिस। तेज-तर्रार समाजवादी नेता, जिसने श्रमिक आंदोलनों के जरिये इंदिरा सरकार की नींव हिला दी थी। 1974 की ऐतिहासिक रेल हड़ताल और फिर आपातकाल में भूमिगत रहकर संघर्ष करना उनकी लड़ाई का हिस्सा बना।

गिरफ्तारी और बड़ौदा डायनामाइट केस
जॉर्ज जब कोलकाता के एक गिरजाघर में छिपे थे, तब सीबीआई ने उन्हें 10 जून 1976 को गिरफ्तार किया। उन पर सरकार ने बड़ौदा डायनामाइट केस के तहत सशस्त्र विद्रोह की साजिश का आरोप लगाया, जो कई विशेषज्ञों की नजर में राजनीतिक प्रतिशोध का हथकंडा था।

जंजीरों में पेशी: क्रूरता की तस्वीर
दिल्ली की अदालत में जॉर्ज की लोहे की जंजीरों में पेशी लोकतंत्र पर पड़े पहरे की प्रतीक बन गई। यह दृश्य तानाशाही की उस हद को दिखाता है, जब विरोध को दबाने के लिए सरकार ने इंसानियत तक ताक पर रख दी।

बिहार से रिश्ता और चुनावी सन्देश
बिहार से जॉर्ज का गहरा रिश्ता था। वही धरती जहां जेपी आंदोलन ने जन्म लिया और आपातकाल के खिलाफ जनक्रांति शुरू हुई। जेल में रहते हुए जॉर्ज ने 1977 का चुनाव मुजफ्फरपुर से जीता—वह जीत तानाशाही पर लोकतंत्र की मुहर थी।

पीएम मोदी का सियासी संकेत
पीएम मोदी का यह जिक्र सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि 2025 के बिहार चुनावों से पहले कांग्रेस पर सीधा हमला भी है। जॉर्ज की जंजीरों में बंधी तस्वीर बीजेपी के लिए एक प्रतीक है—लोकतंत्र की हत्या और उसके खिलाफ संघर्ष का।

निचोड़
जॉर्ज फर्नांडिस की कहानी सिर्फ एक नेता की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जो लोकतंत्र के लिए जान की बाजी लगाने से भी पीछे नहीं हटा। उनकी जंजीरें आज भी हमें लोकतंत्र की कीमत याद दिलाती हैं।

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